संत कवि सूरदास जी जन्म जयंती
संत कवि सूरदास जी की जन्म जयंती के पावन उपलक्ष में गांधी भवन दिल्ली विश्वविद्यालय में सक्षम इंद्रप्रस्थ द्वारा एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम दो सत्रों में विभाजित था और कई अतिथि, विद्यार्थी, शोधार्थी आदि आमंत्रित किए गया। कार्यक्रम किशोर भारती प्रज्वलन से की गई और श्री सूरदास जी के आशीर्वाद से कार्यक्रम का आरंभ किया गया पहले सत्र में एक डॉक्यूमेंट्री प्रदर्शन किया गया जिसमें कि सूरदास जी का प्रारंभ से मृत्यु तक का जीवन का सफर दर्शाया गया, बाल्यकाल से ही सूरदास जी का प्रेम काव्य लेखन को लेकर सर्वाधिक था वह जो कविताएं लिखा करते थे वह अत्यंत ही प्रशंसनीय हुआ करती थी कृष्ण भक्ति जिस प्रकार उनके काव्य में नजर आती है वैसी कृष्ण भक्ति शायद ही विश्व में कहीं और मिल पाए वल्लभाचार्य सूरदास जी से प्रभावित होकर उन्हें अपना शिष्य बना लेते हैं, सूरदास जी कृष्ण भक्ति में इतने लीन थे की जब स्वयं श्रीकृष्ण ने उन्हें दर्शन दिए और उनकी दृष्टि लौट आई तब उन्होंने यह तर्क देते हुए दृष्टि त्याग दी कि उन्होंने जब स्वयं श्रीकृष्ण के दर्शन कर लिए हैं तो अब उन्हें विश्व में किसी और चीज को देखने की आवश्यकता नहीं है, वह प्रभु के इस स्वरूप को अपने मन में संजो कर रखना चाहते हैं इसलिए मैं दृष्टि त्याग देते हैं।
गांधी भवन दिल्ली विश्वविद्यालय के निर्देशक प्रोफेसर के पी सिंह जी भी वहां उपस्थित थे उन्होंने अपने वक्तव्य में कई ऐसी बातें कहीं जोकि सूरदास जी को स्मरण करते हुए एवं समाज के सामने सटीक उदाहरण प्रस्तुत करती है। कार्यक्रम के दूसरे सत्र में चार मुख्य अतिथि थे डॉ. दयाल सिंह पंवार, प्रो. संजीव कुमार , प्रो. भारतेन्द्र पांडेय, प्रो. राजेश शर्मा। दूसरे सत्र में पैनल चर्चा आयोजित हुआ मुख्य अतिथियों ने अपना वक्तव्य प्रस्तुत किया दयाल सिंह जी जो कि सक्षम में राष्ट्रीय संरक्षक है इन्होंने अपने वक्तव्य में कई प्रकार जी प्रोत्साहन जनक बातें कहीं और सभी दृष्टिबाधित को सूरदास जी की तरह जीवन में तत्पर आगे बढ़ने का संदेश दिया। हंसराज कॉलेज के प्रोफेसर डॉ राजेश शर्मा जी ने सूरदास जी की जन्म जयंती पर शुभकामनाएं देते हुए कहां की दृष्टिबाधित होना बाध है परंतु इस बाधा से खुद को झुकने नहीं देना चाहिए और सूरदास जी की तरह खुद को सर्वश्रेष्ठ बनाने की कोशिश करनी चाहिए। दिल्ली विश्वविद्यालय राजनीति विभाग से प्रोफेसर संजीव कुमार जी ने कहा कि दृष्टिबाधित लोग किसी से कम नहीं होते हैं उनको समाज में अन्य लोगों की तरह ही समानता की भावना से देखना चाहिए।
फिर दर्शकों में बैठे शोधार्थी विद्यार्थी आदि सभी को मौका दिया गया कि वह अपनी जो भी जिज्ञासा है एवं प्रश्न है वह पूछ सकते हैं तो कुछ लोगों ने कई अच्छे प्रश्न पूछे जेसी कि दृष्टिबाधित लोगों के प्रति सिंपति नहीं एमपति की भावना कैसे जगाए समाज में, चुकी सूरदास जी हिंदी काव्य लेखन करते थे और सगुण भक्ति काव्य धारा के कवि थे तो भाषा एवं सगुण भक्ति निर्गुण भक्ति पर भी प्रश्न पूछे गए और इन प्रश्नों का चारों ही पैनल ने सहजता से उत्तर दिए।
अंत में धन्यवाद ज्ञापित किया गया और राष्ट्रीय गान भी हुआ।