प्रकृति और संस्कृति के गीतों से गुलज़ार एक शाम
टैगोर कला केन्द्र के नवनिर्मित प्रकोष्ठ का शुभारंभ
भोपाल। सुर-ताल में बंधे गीतों की सामूहिक गुंजार के बीच टैगोर विश्व कला एवं संस्कृति केन्द्र के नवनिर्मित परिसर का शुभारंभ हुआ। रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्व विद्यालय के महत्वपूर्ण सांस्कृतिक प्रकोष्ठ में आयोजित सुरमयी सभा को संबोधित करते हुए कुलाधिपति संतोष चौबे ने कहा कि शीघ्र ही वृन्दगान का एक समूह गठित किया जाएगा। टैगोर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्र-छात्राओं का यह दल भविष्य में हिन्दी की प्राचीन और आधुनिक कविताओं के साथ ही रंग संगीत, विज्ञान गीत तथा राष्ट्रीय चेतना से जुड़े गीतों की प्रस्तुति तैयार करेगा।
टैगोर कला केन्द्र के निदेशक विनय उपाध्याय ने महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की वासंती कविताओं का ज़िक्र करते हुए कहा कि निराला की संगीत से गहरी दिलचस्पी रही। वे राग-ताल के जानकार थे। टैगोर के रवीन्द्र संगीत से निरालाजी गहरे प्रेरित रहे। विश्व विद्यालय के कुलपति डा. ब्रह्मप्रकाश पेठिया, एजीयू की निदेशक अदिति चतुर्वेदी, रजिस्ट्रार पुष्पा असिवाल, मानविकी और कला संकाय की डीन डा. संगीता जौहरी तथा नाट्य विद्यालय के निदेशक मनोज नायर इस मौक़े पर विशेष रूप से उपस्थित थे।
समारोह का मुख्य आकर्षण रही टैगोर नाट्य विद्यालय के वृन्द समूह की संगीत प्रस्तुति। ढलती हुई शाम के गहराते अहसासों के बीच संगीतकार संतोष कौशिक के संयोजन में छात्र कलाकारों ने निरालाजी की कालजयी कविता ‘‘नव पर नव स्वर दे’’ के साथ ही नागार्जुन की कविता ‘अकाल और उसके बाद’ का लयबद्ध गान किया। पानी, श्रम और प्रकृति की महिमा से जुड़ी रचनाओं का भी समूह गान हुआ। कार्यक्रम का संचालन नाट्य विद्यालय के समन्वयक विक्रांत भट्ट ने किया।