संभव कुमारसुचर्चित मोटिवेशनल स्पीकर और एनएलपी गुरु
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जिंदगी एक नाटक है, हम नाटक में काम करते हैं : कपिल

और कैंपस न्यूज़

जिंदगी एक नाटक है, हम नाटक में काम करते हैं पर्दा उठते ही पर्दा गिरते ही, सबको सलाम करते हैं खेल में कभी बजती हैं तालियाँ, और देते हैं लोग कभी गालियाँ जिंदगी एक नाटक है, हम नाटक काम करते हैं
फिल्म : नाटक
गीतकारः आनंद बख्शी

कुछ इसी दार्शनिक अंदाज में आपसे मिलेगा यह 24-25 वर्ष का लड़का कपिल! जिसे आजकल दिल्ली विश्वविद्यालय का कैम्पस ‘कपिल रंगरेज़’ के नाम से पहचानता है। हालांकि कपिल, रोटरी क्लब, हंसराज कॉलेज, मिरांडा हाउस, हिन्दू कॉलेज तथा दिल्ली के विभिन्न अकादमिक कैम्पसों में अपने ‘रंगरेज़’ नाट्य-मंच के माध्यम से अनेक बेहद सफल नाटकों और नुक्कड़ नाटकों का मंचन कर चुके हैं, किन्तु फिर भी वे इस बात को हमेशा ज़ेहन में रखने के हामी हैं कि ‘रंगमंच आपके व्यक्तित्व को वोकल बनाता है। उसे संवारता है। उसको नए आयाम देता है। आपको स्वयं की भावनाओं और दर्शकों/दूसरों की भावनाओं को समझने-समझाने के बेहतरीन विकल्प प्रदान करता है।’ कपिल की ख्वाहिश है कि ‘रंगमंच’ को शिक्षा और व्यक्तित्व निर्माण के एक गंभीर माध्यम के रूप में सभी अकादमिक संस्थाओं में स्वीकार किया जाए। अपनी इस ख्वाहिश को अमली जामा पहनाने की दिशा में वे दिल्ली विश्वविद्यालय में ‘फरवरी 2017 से अपने रंगरेज़ नाट्य-मंच के द्वारा लगातार मुफ्त कार्यशालाओं का आयोजन’ कर रहे हैं। जबकि कपिल के पास भौतिक संसाधनों के नाम पर अपने स्वयं के सपनों, विश्वविद्यालय के कुछ प्राध्यापकों की शुभकामनाओं और युवा विद्यार्थियों के उत्साह-स्नेह के अतिरिक्त लगभग शून्य है। किन्तु यह भी तो सत्य है कि विराट ज्योति-पुंज का उद्भव हमेशा शून्य के गर्भ से ही हुआ है।

कपिल ने दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कॉलेज में सन 2011 में स्नातक के विद्यार्थी के रूप में प्रवेश लिया। कॉलेज के प्राध्यापक और जानेमाने साहित्यकार डॉ. हरीश नवल ने लगभग इसी समय (2012) हिन्दू कॉलेज में ‘अभिरंग’ नाट्य-मंच की स्थापना की। विद्यार्थी के रूप में कपिल की रुचि रंगमंच में प्रारम्भ से ही थी। स्वाभाविक रूप से वे ‘अभिरंग’ नाट्य-मंच से जुड़ गए। ‘अभिरंग’ नाट्य-मंच के सदस्य के रूप में कपिल कई शानदार नाट्य, नुक्कड़ और कौवाली प्रस्तुतियों में अलग-अलग भूमिकाओं को निभाते रहे। अपनी लगन और रंगमंच के प्रति समर्पण की वजह से बहुत जल्दी ही (2012 में) अभिरंग द्वारा कपिल को निर्देशक के रूप में अपना पहला नाटक मिला, जो कि हिन्दी में आधुनिकता के अग्रदूत का कालजयी प्रहसन ‘अंधेर नगरी’ था। पहला अनुभव होने के बावजूद इस नाटक में कपिल को उनकी रंग-सूझ और प्रयोगधर्मी दृष्टि की वजह से काफी सराहा गया। इसके बाद तो जैसे सिलसिला ही चल निकला। सन 2014 में दिल्ली विश्वविद्यालय में पहली अंतर्महाविद्यालयी रंगमंच प्रतियोगिता, हिन्दू कॉलेज में आयोजित हुई। इसमें हिन्दू कॉलेज की तरफ से ‘अभिरंग’ नाट्य-मंच, कपिल के निर्देशन में प्रेमचंद की कहानी प्रसिद्ध और विवादास्पद कहानी ‘सद्गति’ को लेकर उपस्थित हुआ। जैसा कि कपिल बताते हैं कि ‘प्रारम्भ में इस कहानी के मंचन को लेकर कुछ संदेह भी व्यक्त किया गया...’ किन्तु कपिल पर शिक्षकों के भरोसे ने अंततः इसके मंचन को संभव बनाया। यह निर्णय सही साबित हुआ। कपिल के कुशल निर्देशन और साथी कालाकारों के परिश्रम ने इस मंचन को यादगार बना दिया। इस प्रतियोगिता में हिन्दू कॉलेज को द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ।

2014 में कपिल ने स्नातक की शिक्षा पूरी कर, परास्नातक हेतु हंसराज कॉलेज में प्रवेश लिया। हंसराज कॉलेज में कपिल, विद्यार्थियों में बेहद लोकप्रिय शिक्षिका डॉक्टर रमा मैम के संपर्क में आए। कपिल बताते हैं कि रमा मैम से जुड़ना उत्साह और साहस के स्रोत से जुड़ना है। हंसराज कॉलेज में रहते हुए पढ़ाई और रंगमंच दोनों का कार्य चलता रहा। इसी बीच 2014 में उन्हें हिन्दी अकादमी दिल्ली द्वारा ‘अमर शहीद भगत सिंह’ की याद में राजघाट पर मनाए जाने वाले प्रतिष्ठित कार्यक्रम में अपनी रंग-प्रस्तुति देने का अवसर प्राप्त हुआ। इस प्रस्तुति ने कपिल के निर्देशन-कौशल को कैम्पस के बाहर के लोगों में भी पहचान दी। पर शीघ्र ही सभी भारतीय मध्यवर्गीय युवाओं के सामने उपस्थित होने वाला यक्ष प्रश्न कपिल के सामने भी उपस्थित हुआ। कैरियर बनाम चाहत का प्रश्न ! इस प्रश्न से निपटे बिना कम से कम भारत में तो मोक्ष की प्राप्ति संभव नहीं है। कपिल ने भी इस प्रश्न का सामना किया किन्तु कुछ अपने ही अंदाज में । कपिल बताते हैं कि उन्होंने ढाई वर्ष तक एम्स में कनिष्ट हिंदी अनुवादक के रूप में नौकरी की। इस नौकरी से अर्जित आय कपिल के रंगमंचीय प्रेम के लिए समिधा ही साबित हुई। उन्होंने अपनी लगभग पूरी आय रंगकर्म को समर्पित कर दी। एम.ए. करने के पश्चात कपिल ने 17 फरवरी, 2017 को ‘अभिरंग’ नाट्य-मंच के अपने कुछ कनिष्ठ साथियों और विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों- प्रो.रमा, डॉ. महेंद्र प्रजापति, डॉ.हरीश नवल इत्यादि के सहयोग से ‘रंगरेज़’ नाट्य-मंच की स्थापना की।

कपिल बताते हैं कि ‘रंगरेज़’ नाट्य-मंच का उद्देश्य रंगमंच के सामाजिक और अकादमिक महत्त्व के प्रसार के साथ ही कैंपस के भीतर और बाहर मौजूद उन युवाओं को एक मंच प्रदान करना है, जो रंगमंच से प्रेम करते हैं तथा इस विधा को सीखना चाहते हैं। इसके लिए कपिल ‘रंगरेज़’ नाट्य-मंच के माध्यम से हंसराज कॉलेज और दिल्ली विश्वविद्यालय के कुछ अन्य जगहों पर निःशुल्क कार्यशालाओं का आयोजन करते हैं। इन कार्यशालाओं में वे युवाओं को प्रोडक्शन ट्रेनिंग से लेकर अभिनय, रंग-सज्जा, लाइटिंग, साउंड इत्यादि का अभ्यास करवाते हैं। कपिल बताते हैं कि जब रंगमंच की बेसिक जानकारी से भी दूर स्थित युवा कार्यशाला में कुछ ही दिनों में आत्मविश्वास से भरा हुआ दिखता है तो उसके आँखों की चमक उन्हें अपने कार्य की सार्थकता के अहसास से भर देता है। ‘रंगरेज़’ नाट्य-मंच अपने मंचनों में सामाजिक सरोकारों और इन सरोकारों से होने वाले असर को लेकर विशेष सचेष्ट रहता है। शायद यही वजह है कि ‘रंगरेज़’ नाट्य-मंच ने थोड़े ही अरसे में कैंपस में अपनी एक अलग पहचान बना ली है। ‘रंगरेज़’ नाट्य-मंच अपने कलाकार स्वयं तैयार करके इन कलाकारों के साथ अब तक अंधेर नगरी(भारतेंदु), सद्गति, वैश्या, कफ़न(प्रेमचंद), चीफ की दावत (भीष्म साहनी), सड़क के किनारे(मंटो), मनोहरश्याम जोशी और हरीश नवल के व्यंग्यों की बेहतरीन रंग-प्रस्तुतियाँ कर चुका है। दिल्ली विश्वविद्यालय का कैंपस आज रंगरेज़ को जानता-पहचानता ही नहीं है, उम्मीद की नज़र से उसे देखता भी है।